गोड्डा : जिले भर के बीमारी से ग्रसित मरीज आखिरकार जाएं तो कहां सरकारी अस्पतालों में बेहतर व समुचित इलाज तो होता नही लेकिन कुछ जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों की जी तोड़ मांग है कि निजी अस्पतालों में भी सिर्फ भारी भरकम पैसों का खेल होता है इसलिए निजी अस्पतालों को बंद कर देने में ही लाभ है। यह वही निजी अस्पताल है जहां सरकारी अस्पतालों में समुचित व्यवस्था के आभाव के कारण मरीजो को बेझिझक रेफर किया जाता है।
सरकार ने ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर स्वास्थ्य केंद्र एवं उपकेंद्र का भवन बनाकर अरबो रुपया फूंक दिया मगर आज तक वह भवन महज शोभा की वस्तु बनी हुई है। लेकिन आजतक किसी भी सरकार ने इन बड़े बड़े भवनों को अस्पताल का रूप देने के लिए हाथ तक नही बढ़ाया है। भले ही आश्वासन पर आश्वासन मिल रहा होगा लेकिन अबतक उस अस्पताल भवनों को सुचारू रूप से चालू कराने का पहल नही किया है।
जी हां, हम सरकारी अस्पतालों की बात कर रहे है। जिले के प्रमुख अस्पताल सदर अस्पताल जहां छोटे छोटे बीमारी वाले मरीजो को भी निजी अस्पताल में रेफर कर दिया जाता है। सरकारी अस्पताल से रेफर कर देना यह साफ जाहिर करती है कि सरकारी अस्पतालों में वो व्यवस्था नही जो निजी अस्पतालों में है। अगर निजी अस्पतालों की तरह ही सरकारी अस्पतालों में सम्पूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था सरकार मुहैया कराते है तो मरीज निजी अस्पतालों का रुख क्यों करेंगे।
मौजूदा सरकार समुचित स्वास्थ्य व्यवस्था झारखंड वासियों को देने का लगातार दावे पर दावे करने से नही थक रहे है। लेकिन यह दावा कहाँ तक सफलतापूर्वक माना जाय। जहां सरकारी अस्पतालों में मरीजो को बेहतर इलाज देने के लिए सुविधा न हो। सुविधाओं के अभाव में स्वास्थ्य व्यवस्था पर आखिर यह कैसा दावा है। ज्ञात हो कि रेफरल अस्पताल से लेकर सदर अस्पताल तक की हालात एक जैसी है। ऐसे में जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था लचर हो गयी है।
राज्य गठन के दो दशक के बाद भी जिले में अब तक ऐसा अस्पताल नही बन सका है जहाँ मरीजो का बेहतर इलाज हो और उसे बाहर नही जाना पड़े। जिला मुख्यालय के सदर अस्पताल में वेंटिलेटर, आईसीयू, सिटी स्कैन मशीन, इको मशीन जैसे सुविधाएं उपलब्ध नही है। यहाँ विशेषज्ञ चिकित्सकों की भी घोर कमी है।
- ब्यूरो रिपोर्ट, उजागर मीडिया।

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